सम्बोधन चिन्ह / ज्ञानेन्द्रपति - Kavita Kosh
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दिन की फुर्सत के फैलाव-बीच उगे

एक पेड़ के तने से

पीठ टिका कर

जब तुम एक प्रेम-पत्र लिखना शुरू करते हो

कुछ सोचते और मुस्कुराते हुए

तुम्हें अचानक लगता है

कोई तुम्हें पुकार रहा है

कौन है - किधर, इस सूनी दोपहर में

तुम मुड़कर वृथा देखते हो

कि कोई हौले से तुम्हारा कन्धा थपथपाता है

और तुम देखते हो तनिक चौंके-से

पेड़ है, एक पत्ते की अंगुली से छूता तुम्हें--

एक शरारती दोस्ताना टहोका

और तुम उस पेड़ को शामिल होने देते हो अपने सम्बोधन में

सम्बोधन चिन्ह की जगह