सर दर्द जैसे नींद के सीने पे सो गया / बशीर बद्र - Kavita Kosh
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सर दर्द जैसे नींद के सीने पे सो गया
इन फूल जैसे हाथों ने माथा जुँही छुआ

इक लड़की एक लड़के के काँधे पे सोई थी
मैं उजली धुँधली यादों के कुहरे में खो गया

सन्नाटे आए, दरज़ों में झाँका, चले गए
गर्मी की छुट्टियाँ थी, वहाँ कोई भी न था

टहनी गुलाब की मिरे सीने से लग गई
झटके के साथ कार का रुकना ग़ज़ब हुआ

(१९६२)