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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / अष्ठम सर्ग / पृष्ठ ३

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"मैं तो नद का परमार्थ इसे मानूँगा
हित उसका उससे अधिक कौन जानूँगा?
जितने प्रवाह हैं, बहें--अवश्य बहें वे,
निज मर्यादा में किन्तु सदैव रहें वे।
केवल उनके ही लिये नहीं यह धरणी,
है औरों की भी भार-धारिणी-भरणी।
जनपद के बन्धन मुक्ति-हेतु हैं सब के,
यदि नियम न हों, उच्छिन्न सभी हों कब के।
जब हम सोने को ठोक-पीट गढ़ते हैं,
तब मान, मूल्य, सौन्दर्य, सभी बढ़ते हैं।
सोना मिट्टी में मिला खान में सोता,
तो क्या इससे कृत्कृत्य कभी वह होता?"
"वह होता चाहे नहीं, किन्तु हम होते,
हैं लोग उसी के लिए झींकते-रोते!"
"होकर भी स्वयं सुवर्णमयी, ये बातें?
पर वे सोने की नहीं, लोभ की घातें।
यों तो फिर कह दो--कहीं न कुछ भी होता,
निर्द्वन्द्व भाव ही पड़ा शून्य में सोता!"
"हम तुम तो होते कान्त!" "न थे कब कान्ते!
हैं और रहेंगे नित्य विविध वृत्तान्ते!
हमको लेकर ही अखिल सृष्टि की क्रीड़ा,
आनन्दमयी नित नई प्रसव की पीड़ा!"
"फिर भी नद का उपयोग हमारे लेखे,
किसने हैं उसके भाव सोच कर देखे?"
"पर नद को ही अवकाश कहाँ है इसका?
सोचो, जीवन है श्लाघ्य स्वार्थमय किसका?
करते हैं जब उपकार किसीका हम कुछ,
होता है तब सन्तोष हमें क्या कम कुछ?
ऐसा ही नद के लिए मानते हैं हम,
अपना जैसा ही उसे जानते हैं हम।
जल निष्फल था यदि तृषा न हममें होती,
है वही उगाता अन्न, चुगाता मोती।
निज हेतु बरसता नहीं व्योम से पानी,
हम हों समष्टि के लिए व्यष्टि-बलिदानी।"

"तुम इसी भाव से भरे यहाँ आये हो?
यह धनश्याम, तनु धरे हरे, छाये हो।
तो बरसो, सरसै, रहे न भूमि जली-सी,
मैं पाप-पुंज पर टूट पडूँ बिजली-सी।"
"हाँ, इसी भाव से भरा यहाँ आया मैं,
कुछ देने ही के लिये प्रिये, लाया मैं।
निज रक्षा का अधिकार रहे जन जन को,
सबकी सुविधा का भार किन्तु शासन को।
मैं आर्यों का आदर्श बताने आया,
जन-सम्मुख धन को तुच्छ जताने आया।
सुख-शान्ति-हेतु मैं क्रान्ति मचाने आया,
विश्वासी का विश्वास बचाने आया।
मैं आया उनके हेतु कि जो तापित हैं,
जो विवश, विकल, बल-हीन, दीन, शापित हैं।
हो जायँ अभय वे जिन्हें कि भय भासित हैं,
जो कौणप-कुल से मूक-सदृश शासित हैं।
मैं आया, जिसमें बनी रहै मर्यादा,
बच जाय प्रलय से, मिटै न जीवन सादा;
सुख देने आया, दुःख झेलने आया;
मैं मनुष्यत्व का नाट्य खेलने आया।
मैं यहाँ एक अवलम्ब छोड़ने आया,
गढ़ने आया हूँ, नहीं तोड़ने आया।
मैं यहाँ जोड़ने नहीं, बाँटने आया,
जगदुपवन के झंखाड़ छाँटने आया।
मैं राज्य भोगने नहीं, भुगाने आया,
हंसों को मुक्ता-मुक्ति चुगाने आया।
भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया,
नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया!
सन्देश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।
अथवा आकर्षण पुण्यभूमि का ऐसा
अवतरित हुआ मैं, आप उच्च फल जैसा।
जो नाम मात्र ही स्मरण मदीय करेंगे,
वे भी भवसागर बिना प्रयास तरेंगे।
पर जो मेरा गुण, कर्म, स्वभाव धरेंगे,
वे औरों को भी तार पार उतरेंगे।"
"पर होगा यह उद्देश्य सिद्ध क्या वन में?
सम्भव है चिन्तन-मनन मात्र निर्जन में।"
"वन में निज साधन सुलभ धर्मणा होगा,
जब मनसा होगा तब न कर्मणा होगा?
बहु जन वन में हैं बने ऋक्ष-वानर-से,
मैं दूँगा अब आर्यत्व उन्हें निज कर से।
चल दण्डक वन में शीघ्र निवास करूँगा,
निज तपोघनों के विघ्न विशेष हरूँगा।
उच्चारित होती चले वेद की वाणी,
गूँजै गिरि-कानन-सिन्घु-पार कल्याणी।
अम्बर में पावन होम-धूम घहरावे,
वसुधा का हरा दुकूल भरा लहरावै।
तत्त्वों का चिन्तन करें स्वस्थ हो ज्ञानी,
निर्विघ्न ध्यान में निरत रहें सब ध्यानी।
आहुतियाँ पड़ती रहें अग्नि में क्रम से,
उस तपस्त्याग की विजय-वृद्धि हो हम से।
मुनियों को दक्षिण देश आज दुर्गम है,
बर्बर कौणप-गण वहाँ उग्र यम-सम है।
वह भौतिक मद से मत्त यथेच्छाचारी,
मेटूँगा उसकी कुगति-कुमति मैं सारी।"

"पर यह क्या, खग-मृग भीत भगे आते हैं,
मानों पीछे से व्याध लगे आते हैं।
चर्चा भी अच्छी नहीं बुरों की मानों,
साँपों की बातें जहाँ, वहीं वे जानों।
अस्फुट कोलाहल भरित मर्मरित वन है,
वह धूलि-धूसरित उच्च गभीर गगन है।