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सीमाब दशी, तिश्नालबी बाख़बरी है / मख़दूम मोहिउद्दीन

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सीमाब दशी[1], तिश्नालबी[2] बाख़बरी है
इस दश्त में गर रख़्ते सफ़र[3] है तो यही है ।

इक शहर में इक आहुए ख़ुशचश्म[4] से हमको
कम कम ही सही निस्बते पैमाना रही है ।

बेसोहबते रुख़सार[5] अँधेरा ही अँधेरा
गो जाम वही मय वही मयख़ाना वही है ।

इस अहद[6] में भी दौलते कौनेन[7] के बावस्फ
हर गाम[8] पे उनकी जो कमी थी सो कमी है ।

हर दम तेरे अन्फ़ास[9] की गर्मी का गुमाँ है
हर याद तेरी याद के फूलों में बसी है ।

हर शाम सज़ाए है तमन्ना के नशेमन
हर सुबह मये तलख़िए अय्याम[10] भी पी है ।

धड़का है दिले ज़ार[11] तेरे ज़िक्र से पहले
जब भी किसी महफ़िल में तेरी बात चली है ।

वो इत्र तेरी काकुले शबरंग ने छिड़का
महकी है खिरद[12], रुह कली बनके खिली है ।

शब्दार्थ
  1. पारे जैसा
  2. अधरों की प्यास
  3. यात्रा का सामान
  4. हिरणी जैसी आँखों वाली
  5. कपोलों की संगत के बिना
  6. काल
  7. धन की कुनीन जैसी नशीली दवा
  8. क़दम
  9. साँसों
  10. मदिरा की कड़ुवाहट के घूँट
  11. ट्टा दिल
  12. बुद्धि