भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सूरजमुखी का सच / सीमा संगसार

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:45, 6 मार्च 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सीमा संगसार |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCat...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ओ री सूरजमुखी,
ताकती है सूरज का मुँह
अंधेरों से घबराकर
सौंप देती है
अपना सर्वस्व
सूरज के हवाले?
एक सूरज के इशारे पर
कठपुतली-सी नाचती हुई
तुमने अपनी सारी महक खो दी है
तुम्हारा सारा वजूद
समा गया है
सूरज की किरणों में...

ओ री सूरजमुखी
कभी होश आये तो
आना चांदनी रात में
रातरानी बनकर
दीदार करना चाँद से
जब तेरे रूह में
समा जाए चाँदनी
यकीन मानो
छोड़ देगी गुलामी
 सूरज की...