भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"स्त्रियाँ / विजय राही" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=विजय राही |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatKavita...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
 
(कोई अंतर नहीं)

12:13, 25 मार्च 2020 के समय का अवतरण

तुम्हारे कदमों की ताल से हिलती है धरती
तुम्हारे पुरूषार्थ से थर्राता है आकाश
गर तुम नही हिले तो नही हिले पत्ता भी
तुम नही चलो तो नही चले हवा भी ।

कहते हैं तीन बार कहने से
कोई भी बचन
आत्मा से बोला हुआ सत्य बचन
माना जाता है ।

मगर उनका सौ बार गिड़गिड़ाना
फरियाद करना भी सामान्य है
उनकी फरियाद भिखारी की फरियाद से भी
निम्न‌ कोटि की है तुम्हारी नज़र में
जिसकी कभी कोई सुनवाई नही होगी ।

वे तुम्हारे सामने हजार बार गिड़गिड़ाई
कभी प्रेम के लिए , जीवन के लिए
कभी पढ़ने के लिए, आगे बढ़ने के लिए
कभी पीहर के लिए, प्रियजनों से मिलने के लिए
कभी हँसने के लिए, कभी रोने के लिए ।

तुमने हमेशा अनसुना किया
उनकी कातर पुकार को
फिर भी वे चुपचाप सहती रही
कि कभी तुम नरम होंगे उसके लिए
कभी पत्थर पिघलेगा तुम्हारे भीतर का
कभी तुम्हे महसूस होगा
उनके आंसुओं के नमक ।

वे करती रही तुम्हारे लिए व्रत उपवास
खड़ी रही दिनभर भूखी-प्यासी
तुमने नहीं बख़्शा उन्हे
बीमार और गर्भवती होने पर भी
जब मन किया रौंदा अपनी इच्छाओं तले
नही पूछा कभी उनका मन
नही रोका उठाने से अपना हाथ
फिर भी वे रही हमेशा तुम्हारे साथ ।

कोई भी दुख आया तुम्हारे जीवन में
सबसे पहले वे आगे आई
हर संकट में भरी तुम्हारी बाथ ।

तुम्हे प्यास लगी तो बन गई शीतल जल
बिछी तुम्हारे लिए हमेशा सुख की सेज बनकर
फिर भी तुम निकल गये सौंसाट
कभी रात में सोता छोड़कर
कभी दिन-दहाड़े आँखों के सामने से
बिना एक बचन भी बोले
कि कहाँ जा रहे हो ? कब आओगे ?

वे तरसती रही हमेशा
यह बात सुनने के लिए भी कि -
"अपना ख़्याल रखना !"
देखती रही तुम्हे
मुस्कराते हुए
बातें करते हुए
मां-बाप, संगी-साथियों से ।

वे कभी तुम्हारा विश्वास नहीं जीत पाई
तन-मन-जीवन अर्पण करने के बाद भी
तुमने हर बार उन्हे निष्ठुर होकर छोड़ दिया ।

वे फिर भी अग्नि-परीक्षाएँ देती रही
रोती रही और ख़ुद को दुख देती रही
अब कौन उन्हें समझाएंं
वे तो ब्रज की बावरी गोपियों सी हैं
जो गाती रही, गुनगुनाती रही
"माई री वा मुख की मुसकान,
सम्हारि न जैहैं, न जैहैं, न जैहैं॥"