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स्‍वदेशी तहरीक / त्रिलोकचन्‍द महरूम

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वतन के दर्दे-निहां की दवा स्‍वदेशी है
ग़रीब क़ौम की हाजत रवा स्‍वदेशी है

तमाम दहर[1] की रूहे-रवाँ[2] है यह तहरीक[3]
शरीके हुस्‍ने-अमल[4] जा ब जा स्‍वदेशी है

क़रारे-ख़ातिरे-आशुफ़्ता[5] है फ़ज़ा इसकी
निशाने-मंजिले, सिदक़ो-सफ़ा[6] स्‍वदेशी है

वतन से जिनको महब्‍बत नहीं वह क्‍या जानें
कि चीज कौन विदेशी है क्‍या स्‍वदेशी है

इसी के साये में पाता है परवरिश इक़बाल
मिसाले-साय:-ए-बाले-हुमा स्‍वदेशी है

इसी ने ख़ाक को सोना बना दिया अक्‍सर
जहां में गर है कोई कीमिया स्‍वदेशी है

फ़ना के हाथ में है जाने-नातवाने-वतन
बक़ा जो चाहो तो राज़े-बक़ा स्‍वदेशी है

हो अपने मुल्‍क की चीज़ों से क्‍यों हमें नफ़रत
हर एक क़ौम का जब मुद्दआ स्‍वदेशी है

शब्दार्थ
  1. दुनिया
  2. प्राणवायु
  3. आन्‍दोलन
  4. व्‍यावहारिकता
  5. बेक़रार दिल का क़रार
  6. पवित्रता ओर सत्‍य की मंजिल का निशान