भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"हिसार-ए-दीद में जागा तिलिस्म-ए-बीनाई / अब्दुल अहद 'साज़'" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=अब्दुल अहद 'साज़' |अनुवादक= |संग्रह...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
 
(कोई अंतर नहीं)

16:27, 24 मार्च 2020 के समय का अवतरण

हिसार-ए-दीद में जागा तिलिस्म-ए-बीनाई
ज़रा जो लौ तिरी शम-ए-बदन की थर्राई

न जाने किस से बिछड़ने के राग-रंग हैं सब
ये ज़िन्दगी है कि फ़ुर्क़त की बज़्म-आराई

सुकूत-ए-बहर में किस ग़म का राज़ पिन्हाँ था
बस एक मौज उठी और आँख भर आई

ये सम्त सम्त तख़ातुब उफ़ुक़ उफ़ुक़ तक़रीर
तिरा कलाम है मेरा रफ़ीक़-ए-तन्हाई

ख़िरद की रह जो चला मैं तो दिल ने मुझ से कहा
अज़ीज़-ए-मन ब-सलामत-रवी ओ बाज़-आई

उठाए सूर सराफ़ील देखता ही रहा
बशर के हाथ निज़ाम-ए-क़यामत-आराई

किया था जी का ज़ियाँ हम ने इक ग़ज़ल भर को
हज़ार शेर कहे हो सकी न भरपाई