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261 / हीर / वारिस शाह

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दिन चार बना सुका मुंदरां बाल नाथ दी नजर गुजारियां ने
गुस्से नाल विगाड़ के गल सारी डरदे गुरु तो चा सवारियां ने
जोरावरां दी गल है बहत औखी जान बुझके बदी वसारियां ने
गुरु केहा सो ओहनां प्रवान कीता नरदां पुठियां ते बाजी हारियां ने
घुट वट के सम्म बुकुंम[1] नसुम्भ होई काई गल ना मोड़के सारियां ने
लया उसतरा गुरु दे हथ दिता जोगी करन दी नीत चा उजाड़ियां ने
वारस शाह हुण हुकमदी पई पुठी लख वैरियां ठग के मारियां ने

शब्दार्थ
  1. चुपचाप